पारिस्थितिकी तंत्र आधारित आर्द्रभूमि प्रबंधन के माध्यम से आजीविका में सुधार

बेलेडांगा झील के आर्द्रभूमि पर निर्भर समुदाय की आजीविका में सुधार करने के लिए भाकृअनुप-केंद्रीय अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर, कोलकाता ने भाकृअनुप डब्ल्यू3 परियोजना और अनुसूचित जाति उप योजना के तहत एक 'पारिस्थितिकी तंत्र आधारित आर्द्रभूमि प्रबंधन कार्यक्रम' की शुरुआत की है।

बेलेडांगा झील 1958 से बेलेडांगा बैरकपुर मछुआरा सहकारी समिति लिमिटेड द्वारा प्रबंधित एक ऑक्सबो झील है। मानसून में 62 हेक्टेयर क्षेत्र के साथ घोड़े की नाल के आकार का होने के कारण झील अपनी प्रकृति में सुपोषी (यूट्रोफिक) होने के साथ-साथ बृहत् जलीय पादप (मैक्रोफाइट्स) से अत्यधिक प्रभावित होता है। इस परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए भाकृअनुप-सिफ़री ने घेरे संस्कृति प्रौद्योगिकी (पेन कल्चर टेक्नोलॉजी) का सहभागी प्रदर्शन शुरू किया। झील में उत्पादन का मुख्य उद्देश्य बेलेडांगा झील के मछुआरों की आजीविका का समर्थन करना था।

   

मत्स्य उत्पादन को बढ़ाने और आस-पास के गाँवों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार करने के लिए संस्थान ने 2019 में बेलेडांगा झील को अपनाया। बेसलाइन आँकड़ों को एकत्र करने और प्रारंभिक हस्तक्षेपों की रूपरेखा प्रस्तुत करने के बाद संस्थान ने 0.1 हेक्टेयर के लगभग 5 भाकृअनुप-सिफ़री पेन एचडीपीई® स्थापित किए और भारतीय प्रमुख कार्प्स के उन्नत बच्चों का संग्रहण किया जबकि ग्रास कार्प के बच्चे को एक घेरे में संग्रहित किया गया था। ये पेन वैज्ञानिक रूप से फीडिंग सहित सभी रोगनिरोध (प्रोफिलैक्सिस) उपायों के साथ प्रबंधित किए गए थे।

संस्थान ने मछुआरों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम भी आयोजित किए। तीन महीने बाद झील में मछली के बच्चे (फिंगरलिंग्स) को रिलीज किया गया। संस्थान ने मछुआरा सहकारी समिति (एफसीएस) को मछली बीज, भाकृअनुप-सिफ़री केजग्रो® मत्स्य आहार, बाँस से बना हुआ एक प्रकार का नाव (कोरकल्स) जैसी तकनीकी सहायता और जानकारियाँ भी प्रदान की।

2020 में, 629 किलोग्राम/हेक्टेयर की उत्पादकता के साथ लगभग 28,307 किलोग्राम मछली की उपज/कटाई करके एफसीएस ने उत्पादन में लगभग 32% की वृद्धि हासिल की। एक साल के भीतर अच्छा वजन हासिल करने के बाद, ग्रास कार्प मैक्रोफाइट्स को प्राकृतिक तरीके से नियंत्रित करने के लिए भी बहुत प्रभावी था। बेहतर फसल का अनुभव करते हुए, बेलेडांगा के मछुआरों ने यथास्थान (इन-सीटू) बीज पालन के लिए उसी झील में दो और कलमें लगाईं। बेलेडांगा सोसायटी के लोगों की सक्रिय भागीदारी से उन्नत मछली के बच्चे के साथ 7 कलमों का संग्रहण किया गया।

पिछले वर्ष के तिमाही उत्पादन की तुलना में 27.6% अधिक वृद्धि के साथ 2021 की पहली तिमाही में सोसाइटी ने 6,190 किलोग्राम की उपज की। हालाँकि कोविड-19 के कारण मछली पकड़ने की गतिविधि को कम कर दिया गया था, फिर भी उत्पादन की स्थिति में वृद्धि देखी गई।

उत्पादन में वृद्धि ने आनुपातिक रूप से मछुआरों की आय-वृद्धि में योगदान दिया जो अंततः झील पर निर्भर मछुआरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के उत्थान में मदद करेगा। झील आश्रित समुदाय के उपभोग स्वरूप के बारे में अध्ययन करने पर यह पाया गया कि बेलेडांगा से सटे गाँवों में औसतन प्रति व्यक्ति मछली की खपत 53 ग्राम/दिन/व्यक्ति थी, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इस प्रकार, यदि बेलेडांगा झील का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया जाता है, तो आसपास के समुदाय की आजीविका और पोषण संबंधी जरूरतों को सुरक्षित किया जा सकता है।

भाकृअनुप-सिफ़री द्वारा आवश्यकता-आधारित वैज्ञानिक हस्तक्षेप और सामुदायिक लामबंदी ने कमजोर मछुआरा समुदाय के लिए आशा की एक किरण जगा दी है। झील से बेहतर उत्पादन से अधिक सुरक्षित आजीविका मिलेगी जिससे मछुआरों का पलायन कम होगा और बाद में सामाजिक तनाव भी कम होगा।

भाकृअनुप-सिफ़री की टीम भी स्थायी आर्द्रभूमि प्रबंधन के लिए सुशासन स्थापित करने हेतु मछुआरों और उनकी महिला समकक्षों को जुटाने की कोशिश कर रही है जो अंततः आर्द्रभूमि पर निर्भर समुदाय को आजीविका और पोषण सुरक्षा प्रदान करेगी।

‘भाकृअनुप-सिफ़री पेन एचडीपीई®’ और ‘भाकृअनुप-सिफ़री केजग्रो®’ मछली आहार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पंजीकृत ट्रेडमार्क हैं। मार्च, 2018 में भाकृअनुप-सिफ़री द्वारा दोनों प्रौद्योगिकियों का व्यावसायीकरण किया गया है।

(स्त्रोत: भाकृअनुप-केंद्रीय अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर, कोलकाता)