10 जुलाई, 2026, चेन्नई
झींगा उत्पादक किसानों द्वारा उत्पादन जोखिमों से सुरक्षा के उपाय के रूप में जलीय कृषि बीमा को तेजी से अपनाए जाने तथा एल नीनो के जलीय कृषि पर संभावित प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, भाकृअनुप-केन्द्रीय खारे पानी की जलीय कृषि संस्थान (भाकृअनुप-सीआईबीए), चेन्नई, ने अपने मुख्यालय में 8–10 जुलाई, 2026 के दौरान "जलीय कृषि बीमा सर्वेक्षण, जोखिम आकलन एवं हानि मूल्यांकन" विषय पर तीन दिवसीय क्षमता विकास कार्यक्रम का आयोजन किया।
इस कार्यक्रम के अंतर्गत आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा तथा केरल का प्रतिनिधित्व करने वाले एग्रीकल्चरल इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया (एआईसी) के 12 अधिकारियों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया। इसका उद्देश्य जलीय कृषि उत्पादन प्रणालियों के संबंध में उनकी तकनीकी समझ को सुदृढ़ करना तथा बीमा सर्वेक्षण, उत्पादन जोखिम आकलन एवं फसल हानि मूल्यांकन में उनके व्यावहारिक कौशल को बढ़ाना था।

डॉ. एम. कैलासम, निदेशक एवं पाठ्यक्रम निदेशक, भाकृअनुप-सीबा, ने संस्थान की यात्रा तथा पांच प्रमुख बीमा कंपनियों द्वारा अपनाए गए जलीय कृषि बीमा उत्पादों के विकास में उसके अग्रणी योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने जलीय कृषि क्षेत्र की सहनशीलता को मजबूत करने के लिए तकनीकी रूप से सुदृढ़ बीमा तंत्र की बढ़ती आवश्यकता पर बल दिया।
प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन जलीय कृषि क्षेत्र को सुदृढ़ करने में जलीय कृषि बीमा के बढ़ते महत्व पर विशेष बल देते हुए किया गया। भाकृअनुप-सीबा की इस पहल की सराहना की गई तथा जलीय कृषि किसानों की वित्तीय सुरक्षा बढ़ाने के लिए संस्थागत ऋण को जलीय कृषि बीमा के साथ एकीकृत करने हेतु नीतिगत उपायों की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया।
प्रतिभागियों को कार्यक्रम के उद्देश्यों एवं संरचना से अवगत कराया गया। तकनीकी सत्रों में जलीय कृषि उत्पादन प्रणालियां, पोषण एवं पर्यावरण प्रबंधन, रोग प्रबंधन, बीमा सर्वेक्षण प्रक्रियाएं, जोखिम आकलन तकनीकें तथा फसल हानि मूल्यांकन की वैज्ञानिक पद्धतियों पर विस्तार से जानकारी दी गई।
कार्यक्रम में व्यापक व्यावहारिक प्रशिक्षण एवं क्षेत्रीय अनुभव भी शामिल था। इसके अंतर्गत प्रतिभागियों ने चेंगलपट्टू जिले के नेमेली स्थित एक झींगा हैचरी तथा कल्पक्कम स्थित एक व्यावसायिक झींगा फार्म का दौरा किया। प्रतिभागियों ने झींगा किसानों एवं उद्यमियों के साथ संवाद किया, व्यावसायिक पालन-पोषण पद्धतियों का अवलोकन किया तथा क्षेत्र स्तर पर बीमा आकलन एवं हानि मूल्यांकन की व्यावहारिक समझ प्राप्त की।

समापन सत्र में तटीय कृषि समुदायों के कल्याण एवं सतत विकास के लिए अनुसंधान संस्थानों तथा अन्य हितधारकों के बीच निरंतर सहयोग के महत्व पर प्रकाश डाला गया। खारे पानी की जलीय कृषि से संबंधित अनुसंधान एवं विस्तार कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने तथा जलीय कृषि बीमा क्षेत्र को सुदृढ़ समर्थन प्रदान करने में संस्थागत साझेदारियों की भूमिका पर भी बल दिया गया।
कार्यक्रम का समापन सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित कर किया गया। राष्ट्रीय मत्स्य किसान दिवस के आयोजन के साथ आयोजित इस कार्यक्रम ने भारत में जलीय कृषि बीमा के लिए वैज्ञानिक क्षमता सुदृढ़ करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम को चिह्नित किया। प्रतिभागियों ने तकनीकी सत्रों, व्यावहारिक प्रशिक्षण तथा क्षेत्रीय भ्रमण की सराहना की, जिससे जलीय कृषि बीमा सर्वेक्षण, जोखिम आकलन एवं हानि मूल्यांकन के संबंध में उनकी समझ और अधिक सुदृढ़ हुई।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय खारे पानी की जलीय कृषि संस्थान, चेन्नई)







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