भाकृअनुप-केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-सीपीआरआई), शिमला, ने "आलू की किस्मों की पहचान एवं कीट प्रबंधन" विषय पर भट्टी एग्रीटेक प्राइवेट लिमिटेड, जालंधर के कर्मचारियों के लिए आयोजित तीन दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन किया। उद्योग-उन्मुख इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य कंपनी के विस्तारित अनुबंध खेती (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग) कार्यक्रम से जुड़े फील्ड कर्मियों की तकनीकी दक्षता को सुदृढ़ करना था।
समापन सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. ब्रजेश सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-सीपीआरआई, ने कहा कि अनुबंध खेती की सफलता तथा किसानों तक वैज्ञानिक प्रौद्योगिकियों के प्रभावी प्रसार के लिए फील्ड पेशेवरों की तकनीकी क्षमता को सुदृढ़ करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अनुसंधान संस्थानों और निजी क्षेत्र के बीच मजबूत सहयोग से आलू की उत्पादकता, गुणवत्ता और किसानों की आय में उल्लेखनीय सुधार होगा तथा सतत कृषि विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।

सामाजिक विज्ञान प्रभाग के अध्यक्ष ने बताया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से प्रतिभागियों को आलू की किस्मों की पहचान, एकीकृत कीट प्रबंधन, गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन तथा वैज्ञानिक फसल प्रबंधन पर व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक जानकारी प्रदान की गई। उन्होंने कहा कि यह दक्षता विकास कार्यक्रम फील्ड कर्मियों को अनुबंध किसानों को अधिक प्रभावी तकनीकी परामर्श सेवाएँ प्रदान करने तथा उन्नत उत्पादन प्रौद्योगिकियों को अपनाने में सहायता करेगा।
कार्यक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए भट्टी एग्रीटेक प्राइवेट लिमिटेड के कार्यक्रम प्रबंधक ने भाकृअनुप-सीपीआरआई के वैज्ञानिकों की विशेषज्ञता की सराहना की और कहा कि इस कार्यक्रम से किस्मों की पहचान, कीटों की पहचान एवं प्रबंधन, कीट निगरानी, एकीकृत कीट प्रबंधन तथा गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन संबंधी बहुमूल्य जानकारी प्राप्त हुई। उन्होंने यह भी कहा कि संवादात्मक सत्रों और फील्ड प्रदर्शन ने अनुबंध खेती के दौरान आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों का प्रभावी समाधान प्रस्तुत किया तथा उत्पादकता एवं लाभप्रदता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक समाधान उपलब्ध कराए।

भाकृअनुप-सीपीआरआई ने अपने कर्मचारियों के व्यावसायिक विकास के प्रति भट्टी एग्रीटेक प्राइवेट लिमिटेड की प्रतिबद्धता की सराहना की और विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार की उद्योग-केंद्रित क्षमता निर्माण पहल अनुसंधान–उद्योग साझेदारी को और अधिक सुदृढ़ करेगी, उन्नत आलू उत्पादन प्रौद्योगिकियों को अपनाने में तेजी लाएगी तथा भारत की आलू मूल्य श्रृंखला के सतत विकास को समर्थन प्रदान करेगी।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला)







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