23 अप्रैल, 2026, हैदराबाद
भाकृअनुप–केन्द्रीय शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान संस्थान (क्रिडा), हैदराबाद, ने आज नलगोंडा जिले के सूर्यापेट मंडल के गुंड्रामपल्ली (चित्याल) गांव में “मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन एवं संतुलित उर्वरक उपयोग” विषय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। यह कार्यक्रम मेरा गांव मेरा गौरव योजना के अंतर्गत आयोजित किया गया। यह पहल आईसीएआर, नई दिल्ली द्वारा शुरू किए गए उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर गहन अभियान का हिस्सा थी।
कार्यक्रम के दौरान मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन के प्रमुख सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया, जिनमें संतुलित उर्वरीकरण, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम), मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग, जैविक संशोधन तथा जैव-उर्वरकों का प्रयोग शामिल था। उर्वरकों के प्रभावी और विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने के लिए 4आर पोषक तत्व प्रबंधन ढांचा—सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान—पर विशेष जोर दिया गया।
विशेषज्ञों ने मृदा स्वास्थ्य बनाए रखने और पर्यावरण संरक्षण के लिए जैविक खेती, प्राकृतिक खेती तथा सटीक कृषि जैसी वैकल्पिक कृषि पद्धतियों को अपनाने के महत्व पर बल दिया। मृदा गुणवत्ता सुधारने, प्रदूषण कम करने, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाने तथा दीर्घकालिक उत्पादकता बढ़ाने हेतु जैविक खाद, हरी खाद, जैव-उर्वरक, वर्मी कम्पोस्ट, कम्पोस्ट तथा तरल उर्वरकों जैसे पर्यावरण-अनुकूल आदानों के उपयोग की सिफारिश की गई।

रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया तथा मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरणीय स्थिरता बनाए रखने के लिए संतुलित उर्वरीकरण पद्धतियों को अपनाने पर बल दिया गया। विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि कृषि वानिकी प्रणालियों में संतुलित उर्वरीकरण से पोषक तत्वों की उपलब्धता तथा सूक्ष्मजीव गतिविधि में सुधार होता है, जिससे मृदा संरचना बेहतर होती है, जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है साथ ही पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव कम होता है।
इसके अतिरिक्त बताया गया कि कृषि वानिकी प्रणालियां मिट्टी की गहरी परतों से पोषक तत्वों के अवशोषण में सहायक होती हैं, जिन्हें बाद में पत्तियों के गिरने के माध्यम से पुनर्चक्रित किया जाता है। इससे वार्षिक फसलों के लिए पोषक तत्वों की पूर्ति होती है और संपूर्ण प्रणाली की स्थिरता बढ़ती है। इन एकीकृत उपायों को कृषि लाभप्रदता बढ़ाने, स्थिरता सुनिश्चित करने तथा पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक बताया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत टीम ने किसानों के खेतों का दौरा कर मृदा उर्वरता से संबंधित समस्याओं का समाधान किया। यह भी देखा गया कि क्षेत्र के कई किसानों ने सफलतापूर्वक प्राकृतिक खेती पद्धतियों को अपनाया है।
यह कार्यक्रम ज्ञान प्रसार का एक प्रभावी मंच साबित हुआ, जिसने किसानों को बेहतर मृदा स्वास्थ्य एवं अधिक फसल उत्पादकता के लिए संतुलित उर्वरक उपयोग अपनाने हेतु प्रेरित किया।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद)







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