22 जून, 2026, मोतिहारी, बिहार
राष्ट्रीय स्तर के खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत, भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी ने कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके), पिपराकोटी के सहयोग से उर्वरक विक्रेताओं के लिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन पर प्रमाणन पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों हेतु एक प्रशिक्षण-सह-जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य उर्वरक विक्रेताओं तथा कृषि-आदान हितधारकों की मृदा स्वास्थ्य पुनर्स्थापन, संतुलित उर्वरक उपयोग, हरी खाद, फसल विविधीकरण तथा सतत कृषि विकास के लिए एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस) पर क्षमता को सुदृढ़ करना था।
कार्यक्रम का शुभारंभ केवीके वैज्ञानिकों द्वारा परिचयात्मक सत्र के साथ हुआ, जिसके पश्चात खेत बचाओ अभियान के उद्देश्यों पर विस्तृत चर्चा की गई। वक्ताओं ने उर्वरक विक्रेताओं की संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने तथा रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया। यह भी रेखांकित किया गया कि उर्वरक विक्रेता मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन तथा सतत कृषि पद्धतियों की दिशा में किसानों का मार्गदर्शन करने में महत्वपूर्ण ज्ञान भागीदार हैं।
तकनीकी सत्र के दौरान ढैंचा (सेस्बानिया) के माध्यम से हरी खाद के महत्व तथा धान आधारित प्रणालियों में हरे चने और एजोला को जैविक नाइट्रोजन स्रोत के रूप में शामिल करने पर प्रकाश डाला गया। प्रतिभागियों को बताया गया कि हरी खाद न केवल पोषक तत्व प्रदान करती है, बल्कि यह मृदा में जैविक पदार्थ को बढ़ाती है, सूक्ष्मजीव गतिविधि को सुदृढ़ करती है, पोषक तत्व उपयोग दक्षता में वृद्धि करती है तथा दीर्घकालिक मृदा स्वास्थ्य को मजबूत करती है।

वार्षिक फसल चक्र में कम से कम एक दलहन फसल को शामिल करने के महत्व पर भी बल दिया गया। ग्रीष्मकालीन मूंग तथा ढैंचा की जड़ ग्रंथियों के प्रदर्शन के माध्यम से जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण में उनकी भूमिका को समझाया गया। किसानों एवं प्रशिक्षुओं को बताया गया कि अच्छी तरह विकसित ढैंचा फसल लगभग 50–60 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हैक्टर प्रदान कर सकती है, जो लगभग 110–130 किलोग्राम यूरिया प्रति हैक्टर (लगभग 2.5–3 बोरी यूरिया) के बराबर है, जिससे धान की अगली फसल में उर्वरक आवश्यकता कम होती है।
वक्ताओं ने समय पर बुवाई, फसल नियोजन तथा फसल कैलेंडर आधारित किस्म चयन के महत्व पर भी जोर दिया। यह समझाया गया कि बुवाई समय और स्थानीय जलवायु परिस्थितियों के अनुसार फसल किस्मों का चयन उत्पादकता बढ़ाने, संसाधन उपयोग दक्षता में सुधार करने तथा जलवायु संबंधी जोखिमों को कम करने के लिए आवश्यक है। प्रतिभागियों को जलवायु-सहिष्णु फसल किस्मों और वैज्ञानिक फसल नियोजन को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
सब्जियों, खेत फसलों तथा बागवानी फसलों के लिए पोषक तत्वों के पर्यावरण-अनुकूल और सतत स्रोत के रूप में वर्मी कम्पोस्टिंग के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। किसानों को स्थानीय रूप से उपलब्ध जैविक संसाधनों का उपयोग करके गुणवत्तापूर्ण वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने तथा मृदा जैविक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
वैज्ञानिकों ने फसल विविधीकरण, हरी खाद, जैव उर्वरक, फसल अवशेष पुनर्चक्रण तथा संरक्षण कृषि पद्धतियों के माध्यम से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के व्यावहारिक उपायों पर भी चर्चा की। प्रतिभागियों को नियमित मृदा परीक्षण तथा अनुशंसित उर्वरक मात्रा के उपयोग को बढ़ावा देने की सलाह दी गई, जिससे पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार हो और अनावश्यक उर्वरक व्यय कम हो सके।
उत्तर बिहार के जलभराव एवं बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस) के महत्व पर विशेष बल दिया गया। वैज्ञानिकों ने समझाया कि फसल, पशुधन, मत्स्य पालन, बागवानी तथा अन्य सहायक उद्यमों के एकीकरण से कृषि लचीलापन बढ़ता है, आय के अवसर सुदृढ़ होते हैं, संसाधन उपयोग दक्षता में वृद्धि होती है तथा जलवायु अनुकूलन में सहायता मिलती है।

प्रतिभागियों को फसल अवशेष जलाने के हानिकारक प्रभावों तथा मृदा में जैविक कार्बन, पोषक तत्व उपलब्धता, मृदा नमी संरक्षण और सूक्ष्मजीव गतिविधि में सुधार हेतु फसल अवशेष पुनर्चक्रण के लाभों के बारे में भी जागरूक किया गया।
प्रशिक्षुओं ने कार्यक्रम में उत्साहजनक सहभागिता दिखाई और किसानों के बीच संतुलित उर्वरक उपयोग, हरी खाद, मृदा परीक्षण, फसल विविधीकरण तथा एकीकृत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने की अपनी इच्छा व्यक्त की।
कार्यक्रम का समापन इस सशक्त संदेश के साथ हुआ कि स्वस्थ मृदा, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण तथा एकीकृत कृषि प्रणालियाँ उत्पादक, लाभकारी और जलवायु-सहिष्णु कृषि प्रणाली के निर्माण के लिए आवश्यक हैं। आईसीएआर-एमजीआईएफआरआई तथा केवीके पिपराकोटी के वैज्ञानिकों एवं कर्मचारियों ने कार्यक्रम में सक्रिय योगदान दिया और सतत कृषि एवं मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन के लिए क्षेत्र-उन्मुख सिफारिशें प्रदान कीं।
(स्रोत: भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी)







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