7-10 अक्टूबर, 2026, आंध्र प्रदेश
भाकृअनुप–केन्द्रीय तटीय कृषि अनुसंधान संस्थान, गोवा ने द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) के सहयोग से एडीबी-वित्तपोषित परियोजना “लघुधारक मछली पालन में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के लिए क्षमता निर्माण” के तहत 7 से 10 अक्टूबर, 2026 तक आंध्र प्रदेश में जलवायु-सहनीय मछली पालन और वित्तीय साक्षरता पर चार दिवसीय प्रशिक्षण-सह-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम में 7 अक्टूबर को पालकोल्लू में एक प्रशिक्षण सत्र, इसके बाद 8 अक्टूबर को कैकालुरु में एक सत्र और 9 तथा 10 अक्टूबर को जलीय कृषि फार्मों का क्षेत्र भ्रमण शामिल था।
इस पहल का उद्देश्य किसानों के तकनीकी ज्ञान को बढ़ाना, जलवायु-स्मार्ट जलीय कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना, वित्तीय सेवाओं और बीमा के बारे में जागरूकता में सुधार करना और लघुधारक मछली किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों के व्यावहारिक समाधानों की पहचान करना था।
तकनीकी सत्रों में मछली पालन, जलवायु-स्मार्ट जलीय कृषि, फार्म प्रबंधन, रोग की रोकथाम, सतत तटीय जलीय कृषि नियमों और बीमा को शामिल किया गया। जलवायु-स्मार्ट जलीय कृषि पर सत्र में कार्यक्रम के उद्देश्यों को समझाया गया, जबकि एक अन्य सत्र में मछली पालन पर चर्चा की गई। झींगा और मछली पालन में मौजूदा मुद्दों और चुनौतियों पर भी चर्चा की गई।

“छोटा तालाब, स्मार्ट खेती, अधिक लाभ” शीर्षक वाले एक सत्र में नवोन्मेषी और कुशल पालन पद्धतियों पर प्रकाश डाला गया। सतत तटीय जलीय कृषि और झींगा बीमा के वैधानिक प्रावधानों को भी समझाया गया। कार्यक्रम में मत्स्य पालन अधिकारियों, वित्तीय क्षेत्र के प्रतिनिधियों और किसान संघ के प्रतिनिधियों का योगदान भी शामिल था, जिसके बाद संवादात्मक चर्चाएं और प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किए गए।
क्षेत्र भ्रमण ने पंगेसियस, सीबास, झींगा तथा केकड़ा पालन में लगे किसानों के साथ बातचीत करने और उनकी मौजूदा पालन पद्धतियों तथा उत्पादन संबंधी बाधाओं को समझने के अवसर प्रदान किए। प्रमुख चिंताओं में गुणवत्तापूर्ण बीज की सीमित उपलब्धता और अधिक लागत, रोगों का प्रकोप, जल की गुणवत्ता में गिरावट, उच्च तापमान, आहार प्रबंधन, अपर्याप्त तकनीकी सहायता और विपणन संबंधी कठिनाइयां शामिल थीं।
सीबास पालकों ने नहर के पानी में विषाक्त शैवाल प्रस्फुटन और जीवित आहार के विकल्प के रूप में किफायती तैयार आहार की आवश्यकता को लेकर चिंताओं को रेखांकित किया। केकड़ा पालकों ने बेहतर बीज आपूर्ति, स्थानीय हैचरियों, प्रदर्शन फार्मों, बेहतर विपणन चैनलों, फसल बीमा जागरूकता और तकनीकी सहायता की आवश्यकता की पहचान की। इन संवादों ने भविष्य की क्षमता निर्माण गतिविधियों और तकनीकी हस्तक्षेपों के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद की।

कुल मिलाकर, चार दिवसीय कार्यक्रम ने किसानों, वैज्ञानिकों, मत्स्य पालन अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और उद्योग प्रतिनिधियों के बीच संवाद को मजबूत किया। 27 महिलाओं सहित 146 किसानों की भागीदारी ने समावेशी ज्ञान साझाकरण और क्षमता विकास को समर्थन दिया।
प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय अवलोकन भविष्य में किसान-उन्मुख प्रशिक्षण, तकनीकी प्रदर्शनों और विस्तार गतिविधियों का मार्गदर्शन करने में मदद करेंगे, ताकि फार्म प्रबंधन में सुधार किया जा सके, जलवायु-सहनीय जलीय कृषि को बढ़ावा दिया जा सके, वित्तीय जागरूकता को मजबूत किया जा सके और आंध्र प्रदेश में लघुधारक मछली किसानों के बीच सतत आजीविका को समर्थन दिया जा सके।
कार्यक्रम में 27 महिलाओं सहित कुल 146 किसानों ने भाग लिया।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय तटीय कृषि अनुसंधान संस्थान, गोवा)








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