18 अक्टूबर, 2026, मऊ
भाकृअनुप-राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो, कुशमौर, मऊ ने आज एक किसान सम्मेलन का आयोजन किया। डॉ. एम.एल. जाट, सचिव (डेयर) एवं महानिदेशक (भाकृअनुप) ने मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।
कार्यक्रम में डॉ. राजबीर सिंह, उप महानिदेशक (कृषि प्रसार), भाकृअनुप; डॉ. डी.के. यादव, उप महानिदेशक (फसल विज्ञान), भाकृअनुप; डॉ. ए. आनंदन, के निदेशक, एनआईएसएसटी, मऊ; डॉ. राजेश सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी और डॉ. राघवेंद्र सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, कानपुर, भी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत गणमान्य व्यक्तियों के स्वागत, वृक्षारोपण और भाकृअनुप-एनबीएआईएम, मऊ में राष्ट्रीय कृषि महत्वपूर्ण सूक्ष्मजीव कल्चर संग्रह (एनएआईएमसीसी) के शिलान्यास समारोह के साथ हुई। इसके बाद किसान सम्मेलन में दलहन और तिलहन की कृषि उत्पादकता बढ़ाने, गुणवत्तापूर्ण बीजों के उपयोग को बढ़ावा देने, आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकियों को अपनाने और कृषि उत्पादन में सूक्ष्मजीवों की भूमिका को मजबूत करने सहित प्रमुख मुद्दों पर चर्चा हुई।

अपने संबोधन में डॉ. जाट ने दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता हासिल करने, उन्नत बीजों और आधुनिक उत्पादन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने तथा वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी नवाचार को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। आयातित उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने सूक्ष्मजीव-आधारित प्रौद्योगिकियों को कृषि परिवर्तन की नींव बताया। उन्होंने जैविक संसाधनों के प्रभावी उपयोग और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के विकास को सुनिश्चित करने में गोबरधन योजना, बायो-सीएनजी, राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन और ग्रीन अमोनिया की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला।
उन्होंने दलहन और तिलहन में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, ऐसी कृषि प्रणालियों में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की भूमिका और जागरूकता सृजन, जनभागीदारी तथा किसान-केंद्रित कृषि प्रसार के महत्व पर भी चर्चा की। कृषि, पोषण और स्वास्थ्य के बीच अंतर्संबंधों को रेखांकित करते हुए उन्होंने “फूड ऐज मेडिसिन” की अवधारणा और भाकृअनुप तथा आईसीएमआर की सेहत पहल का उल्लेख किया।
डॉ. यादव ने कृषि अनुसंधान में वैज्ञानिक उत्कृष्टता पर जोर देते हुए किसानों की व्यावहारिक जरूरतों के अनुरूप अनुसंधान, वैज्ञानिक प्रौद्योगिकियों के प्रभावी हस्तांतरण और कृषि अनुसंधान संस्थानों तथा कृषि प्रसार प्रणाली के बीच मजबूत समन्वय का आह्वान किया। उन्होंने किसानों की आय बढ़ाते हुए कृषि को लाभकारी, टिकाऊ और स्वास्थ्योन्मुख बनाने के महत्व को रेखांकित किया।

डॉ. राजबीर ने जोर देकर कहा कि विकसित भारत @2047 के विजन को हासिल करने के लिए एकल फसल पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक फसल प्रणाली और फसल विविधीकरण को अपनाना आवश्यक है। उन्होंने दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने, दाल मिलों की स्थापना और उन्हें मजबूत करने, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने, विपणन प्रणालियों में सुधार करने तथा किसानों को बेहतर लाभ सुनिश्चित करने के लिए किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को प्रोत्साहित करने पर भी जोर दिया।
कार्यक्रम का समापन किसानों, वैज्ञानिकों और अधिकारियों के बीच संवादात्मक आदान-प्रदान के साथ हुआ। कार्यक्रम में दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता हासिल करने, सूक्ष्मजीव-आधारित कृषि प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने तथा किसानों की आय बढ़ाने के लिए अनुसंधान और प्रसार गतिविधियों को मजबूत करने के महत्व को रेखांकित किया गया। किसान सम्मेलन में 800 से अधिक किसानों और कृषक महिलाओं ने भाग लिया।
डॉ. आलोक श्रीवास्तव, निदेशक, भाकृअनुप-एनबीएआईएम, ने औपचारिक धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के किसान और 7 केवीके ने कार्यक्रम में भाग लिया।
(स्रोत: भाकृअनुप-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, जोन-III, कानपुर)








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